Saturday, September 24, 2016

फिल्म समीक्षा

      झिझक की बेड़ियां तोड़ खुशियों की तलाश करती पार्च्ड


पिछले हफ्ते पिंक देखी थी, इस हफ्ते पार्च्ड. दोनों में ही औरतों की जर्नी. एक में दुनिया की भीड़ में अपनी जगह तय करती औरतों की जर्नी, तो दूसरे में मुरझाई-कुम्हलाई अपनी जिंदगी में खुद के अंदर जज्ब अपनी खुशियां तलाशती औरतों की जर्नी. खूशी की बात ये है कि हिंदी सिनेमा अब ऐसी अपारंपरिक कहानियां गढ़ने की हिम्मत दिखाने लगा है. है तो ये भले ही तीन औरतों की कहानी , पर गौर से देखें तो आज हर ओर भीड़ में कई ऐसी महिलाएं दिखेंगी जो पुरूषों की जिंदगी सींचते-सींचते कब खुद ठूंठ बन गयी उन्हें खुद पता नहीं चला. पार्च्ड दैहिक और मानसिक स्तर पर सूख चुकी उन्हीं औरतों द्वारा अपने सूखेपन को सींच खुद को हरा-भरा कर लेने की कहानी है. निर्देशक लीना यादव ने बड़ी ही खूबसूरती से तीन लड़कियों के जरीये भीड़ में गूम उन सारे चेहरों को झिझक और बेड़ियों सरीखी वजर्नाएं तोड़कर खुशियां चुनने की एक राह दिखा दी है.
कहानी रानी(तनिष्ठा चटर्जी), लाजो(राधिका आप्टे) और बिजली(सुरवीन चावला) की है. यात्र में जानकी और गुलाब जैसे सहयात्री भी हैं. रानी कम उम्र में ही शादी के बाद मां बन चुकी है. शादी के साल भर बाद ही उसके पति की मौत हो गयी थी. अपने बेटे को पालने से लेकर उसके शादी तक वो खुद को दुनियादारी की आग में झोंकती रहती है. उसकी जिंदगी में खुशियों के कुछ पल आते हैं तो बस उसके मोबाइल की वजह से. एक अनजानी क ॉल बार-बार उसकी अतृप्त इच्छाओं पर खुशियों की बौछार कर जाती है. लाजो मां नहीं बन पाने की कमजोरी की वजह से पति द्वारा शारीरिक प्रताड़ना की शिकार है. और बिजली, इन सबसे अलग अपनी खुशियां हासिल करने के लिए शरीर का इस्तेमाल करती है. वो गांव के मर्दों की जरूरतें पूरी कर बदले में अपनी चाहत हासिल करती है. गुलाब रानी का बेटा है. जानकी से शादी के बाद भी वो अपनी जरूरतें घर के बाहर ही पूरी करता है. बिजली उन तीनों के अंदर कैद खुशियों के दरवाजे खोलने का क ाम करती है. वो लाजो को मां बनने की खुशी हासिल करने के लिए अपने पति से इतर जाने की राह चुनने को कहती है और रानी अपने बेटे की जकड़न से मुक्त कर जानकी को उसके प्रेमी संग आजाद कर देती है.
लीना की ये फिल्म बौद्धिक स्तर पर कईयों को नागवार गुजरेगी. पर औरतों की वही जकड़न और घुटन जब वो खुद के अंदर जज्ब कर देखेंगे तो वो लीना के इस यात्रा से सहमत हुए बिना नहीं रह सकेंगे. लीना की इस यात्रा को उनकी अभिनेत्रियों का भरपूर साथ मिला है. राधिका ने कहानी की जरूरत के लिहाज से खुद को आवश्यक विस्तार दे दिया है. उनकी तोड़ी लकीरों ने लीना का क ाम निश्चित ही आसान कर दिया ह ोगा. तनिष्ठा के भाव संप्रेशनऔर सुरवीन की स्वछंदता भी कहानी को खुलकर खिलने का मौका देती है. पर आखिर में ये बात बतानी जरूरी हो जाती है कि फिल्म केवल व्यस्कों के लिए है सो थियेटर के रूख में परिपक्वता जरूरी है.
क्यों देखें- वषों से चली आ रही ट्रेडिशनल माइंडसेट बदलने के लिए ऐसी कहानियां निहायत जरूरी हैं.
क्यों न देखें- बेशक फिल्म नाबालिकों के लिए नहीं है.


फिल्म समीक्षा

                              सपनों को जीना सिखाती है बैंजो
http://epaper.prabhatkhabar.com/945980/PATNA-City/CITY#page/10/1
जिंदगी आपको हमेशा दो च्वाइस देती है, या तो आप अपन गरीबी और मुफलिसी को अपनी नियति मानकर उसके साथ जीना सीख लो या उसे अपने पंख बनाकर अपने सपनों को उड़ान दे दो. बैंजो दूसरा रास्ता अख्तियार करती है. पेट की भूख मिटाने को क ाम करने के साथ-साथ अपनी ख्वाहिशों को जीने का तरीका बताती है. मराठी फिल्मों के जाने-माने निर्देशक रवि जाधव ने अपनी पहली हिंदी फिल्म के जरीये इसी जज्बे और हौसले की कहानी कही है. फिल्म शायद कुछ ज्यादा खूबसूरत बन पड़ती अगर निर्देशक मुख्य कहानी में सिनेमाई तड़का डालने के चक्कर में कुछ मसाला मिश्रण से बच पाते तो. पर इसके बावजूद रवि ने जिस खूबसूरती से मुंबई के चॉल की जिंदगी और उसमें बसे लोगों के सपनों को फिल्माया है वो क ाबिल ए तारीफ है. और इस कोशिश में उनका भरपूर साथ दिया है रितेश देशमुख ने.
कहानी चॉल में रहने वाले चार लड़कों तराट(रितेश देशमुख), ग्रीस(धर्मेश), पेपर(आदित्य कुमार) और वाजा(राम मेनन) की है. क ाम करने के साथ-साथ चारों बैंजो बजाते हैं. एक दिन गणपति महोत्सव में बैंजो बजाते उनका ऑडियो क्लीप न्यूयार्क की कृष(नरगिस फाखरी) के हाथ लग जाता है. कृष खुद म्यूजिक की दूनिया में अपना नाम बनाना चाहती है. एक म्यूजिक कंसर्ट में अपनी बनायी म्यूजिक भेजने के लिए वो उन चारों को तलाशती मुंबई आ जाती है. यहां वो चारों को मिल तो जाती है पर चारों का अनप्रोफेशनल रवैया उनके आड़े आ जाता है. काफी मुश्किल से वो इन सब बातों को हैंडल कर ही रही होती है कि इसी बीच राजनेता पाटिल के लिए वसूली करने वाला तराट एक केस में पुलिस के चंगूल में फंस जाता है. अपने सपने के टूटने से बिखरी कृष वापस न्यूयार्क चली जाती है. पर इन सबके बीच पीछे छोड़ जाती है वो सपना जिसे अब उन चारों लड़क ों को पूरा करना था. 
कहानी और बैकड्रॉप के लिहाज से कलाकारों का चयन बिलकुल वाजिब लगता है. तराट के किरदार में रितेश ने इसे मराठी परिवेश के काफी आस-पास रखा है. अबतक उपयुक्त भुमिकाओं से वंचित रहे रितेश ने किरदार की मनोदशा और जरूरी उर्जा को काफी संयमित तरीके से समावेशित किया है. धर्मेश व अन्य किरदार भी परिवेश की जरूरतों के साथ पूरा न्याय करते हैं. फिल्म की खास बात ये कि बैंजो जिनसे शायद अधिकांश भारतीय अबतक अंजाने हैं, अपनी मधूर धून के साथ आपको बार-बार थिरकने का पूरा मौका देती है. 

Wednesday, September 21, 2016

फिल्म समीक्षा: राज र ीबूट

     नये पैकेट में पूराने सामान की तरह है राज र ीबूट

http://epaper.prabhatkhabar.com/938802/PATNA-City/CITY#page/12/1
विक्रम भट्ट ने खुद को एक ऐसे खांचे में ढाल लिया है कि दर्शक अब उनसे कुछ अलग की उम्मीद भी नहीं करते. और वो भी दर्शकों को एक अंतराल के बाद अपनी उसी दुनिया में ले जाते हैं, जहां कुछ छिपे राज होते हैं, बदले की आग होती है और परालौकिक शक्तियों का बसेरा होता है. उन्होंने ऐसे मायाजाल रचने में खुद को पारंगत कर लिया है पर अफसोस एकरसता के भंवर से खुद को बचा नहीं पाये.  कुछ नया नहीं होने की वजह से सबकुछ देखा-देखा सा लगता है. थ्रिल के स्तर पर भी दिमाग कुछ और, कुछ और की मांग करता रह जाता है और फिल्म खत्म हो जाती है. पर ऐसा नहीं कि फिल्म में देखे जाने लायक कुछ भी नहीं. कहानी, सस्पेंस, फिल्मांकन और नयनाभिराम लोकेशंस के लिए फिल्म एक बार तो देखी ही जा सकती है.
सायना(कृति खरबंदा) और रेहान (गौरव अरोड़ा) रोमानिया में एक-दूसरे से मिलते हैं. दोनों में प्यार होता है और दोनों शादी करके इंडिया में सेटल हो जाते हैं. कुछ सालों बाद रेहान को फिर से र ोमानिया की एक अच्छी कंपनी में जॉब ऑफर होता है. वो वापस वहां नहीं जाना चाहता पर सायना की जिद की वजह से प्रपोजल एक्सेप्ट कर लेता है. वहां उन्हें रहने को जो घर मिलता है उसके बारे में ये धारणा थी कि वो हान्टेड है. वहां शिफ्ट होने के दिन से ही सायना के साथ अजीब-अजीब घटनाएं होने लगती हैं. वो रेहान को ये बताती है पर वो उसपर विश्वास नहीं करता. फिर सायना की मुलाकात आदित्य(इमरान हाशमी) से होती है. आदित्य उसका पूर्व प्रेमी था पर उसकी हरकतों से तंग आकर सायना ने उसे छोड़ दिया था. वो सायना को बताता है कि उसके साथ होने वाली हर घटना को वो सपने में पहले ही देख लेता है. सायना उसका विश्वास नहीं करती पर पर वो उसके साथ घटने वाली हर घटना के बारे में उसे बताता है. आदित्य उसकी मदद करना चाहता है. वो बताता है कि रेहान ने उससे एक राज छुपाया है और वो ये कि रोमानिया छोड़ने से पहले उसके हाथों किसी का खून हुआ था. पर इससे पहले कि वो रेहान से ये सब पुछ पाती एक बूरी आत्मा उसके शरीर पर कब्जा कर लेती है. उसे बचाने के लिए रेहान तांत्रिक का सहारा लेता है. फिर उन सबके सामने खुलता है ऐसा राज जिसकी वजह से ये सारी घटनाएं हो रही हैं.
भट्ट कैंप के चहेते बन चुके इमरान हाशमी अभिनय के स्तर पर सालों से एक ही परिधि के चारो ओर घुमते नजर आते हैं. ऐसा लगता है उन्होंने भी अब अपनी प्रचलित सीरियल किसर की भुमिका से बाहर आने की जद्दोजहद छोड़ दी है. गौरव अरोड़ा व कृति खरबंदा ने अपने हिस्से की भुमिका सहजता के साथ निभाया है. गाने सूनने योग्य तो हैं पर देर तक असर नहीं छोड़ पाते. हां रोमानिया के प्राकृतिक दृश्य जरूर एक ठंडक का अहसास देते हैं. कुल मिलाकर टाइम पास के लिए फिल्म एक बार देखी जा सकती है.
      

Sunday, September 18, 2016

फिल्म समीक्षा:


 पिंक देखिये और तय क ीजिये, आप कहां खड़े हैं
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अभी कुछ दिनों पहले अमिताभ बच्चन ने एक भावनात्मक पत्र लिखा था, अपनी नातिन नव्या और पोती आराध्या के नाम. तब शायद समझ नहीं पाया था कि अचानक अमिताभ के अंदर ऐसे किस वैचारिक दर्द ने उथल-पुथल मचाया जिसने उन्हें ऐसा लिखने पर विवश किया. पर पिंक देख समझ में आया कि वो आंतरिक हलचल अचानक नहीं था, निश्चित ही फिल्म निर्माण की प्रक्रिया और उसकी किरदार में समाये अमिताभ ने उसकी वेदना को अपने कलम की स्याही बना डाली होगी. पिंक महज एक सिनेमा नहीं है, सोच है उस पुरूषवादी समाज की, जिसकी भेदती निगाहों के बीच हर रोज किसी लड़की को अपना रास्ता तलाशना पड़ता है. निर्देशक अनिरूद्ध राय चौधरी की सोच थियेटर में आपके अंदर पल भर भी निश्चिंतता का भाव नहीं पनपने देगी. आप हर दृश्य के साथ अपने आस-पास की देखी घटना का मिलान करेंगे, हर किरदार में आपको कोई जाना-पहचाना चेहरा नजर आयेगा और हर संवाद आपको गहरे कचोटेगा. पिंक हर उस पुरूषवादी सोच को कटघरे में खींचती है जिनके लिए लड़कियों के कपड़े, उसके उठने-बैठने, बोल-चाल के तरीके और उसके खान-पान उसका कैरेक्टर तय करते हों. अफसोस ऐसी सोच के लोग गलत के खिलाफ महिलाओं के हक में थियेटर में तालियां तो बजाते हैं, पर बाहर आते ही फिर उसी कुंठित आवरण में खुद को समेट लेते हैं.
कहानी दिल्ली में जॉब करने वाली तीन लड़कियों मीनल अरोड़ा(तापसी पन्नू), फलक अली(कृति कुल्हारी) और एंड्रिया (एंड्रिया तरियांग) की है. आजाद ख्यालों वाली तीनों लड़कियां एक रॉक कंसर्ट के दौरान राजवीर (अंगद बेदी) व उसके दोस्तों डिंपी (राहुल टंडन) और विश्वा (तुषार पांडे) से मिलती हैं. डिंपी और मीनल के क्लासमेट होने की वजह से सब आपस में कंफर्ट फ ील करती हैं. सब खाते-पीते और मौज-मस्ती करते हैं. घटना उस वक्त मोड़ लेती है जब तीनों लड़कियों की मोडेस्टी को लड़के खुद के लिए मौका मान बैठते हैं. मीनल के इनकार के बावजूद राजवीर उससे जबरदस्ती की क ोशिश करता है. और इस क ोशिश में हुई हाथापाई में मीनल के हाथों राजवीर के सिर पर गहरी चोट आती है. घटना से घबरायी लड़कियां इस हादसे को भूलना चाहती हैं पर बदले की आग में राजवीर और उसके दोस्त ऊंची रसूख का इस्तेमाल कर उन्हें झूठे केस में फंसा देते हैं. सामाजिक तौर पर भी उन्हें तिरस्कृ त किया जाता है. पुलिस मीनल को अरेस्ट कर लेती है. तब उसी की सोसायटी में रहने वाले बुजूर्ग वकील दीपक सहगल(अमिताभ बच्चन) उसका केस अपने हाथ में लेते हैं. क ोर्ट रूम में लड़कों के वकील प्रशांत(पीयुष मिश्र) मीनल और उसकी सहेलियों को प्रोफेशनल सेक्स वर्कर साबित करने की क ोशिश करते हैं. झूठे गवाह और सबूतों के दम पर जीत की उसकी इस क ोशिश से दीपक सहगल का तजूर्बा किस हद तक लड़ाई लड़ पाता है इसका मुजायरा आप खुद थियेटर में करें तो बेहतर होगा.
फिल्म भले अपने धीमेपन या मसालों के कम तड़का की वजह से थोड़ी खींज दे, पर कहानी के पीछे की सोच थियेटर के बाहर भी आपका पीछा नहीं छोड़ने वाली. तापसी और कृति स्थिति की भयावहता से जुझती लड़कियों के किरदार में समा सी जाती हैं. आश्चर्य होता है क ाफी समय से बॉलीवूड में होने के बावजूद हिंदी फिल्मकार तापसी की योग्यता का भरपूर उपयोग क्यों नहीं कर पाये. पीयुष और एंड्रिया भी सराहनीय हैं. पर अमिताभ, उम्र के इस पड़ाव में अपने हर अगले कदम से आश्चर्यचकित करते अमिताभ वाकई शोध के विषय हैं. उम्र व बीमारियों से जुझने के बावजूद लड़कियों के हक में लड़ते वकील सहगल के किरदार की मनोदशा उनसे बेहतर शायद ही कोई समझ पाता.
क्यों देखें- वाकई अगर अपनी सोच को सकारात्मक दिशा में बदलने की ओर कदम उठाना चाहते हों तो एक बार जरूर देखें.
क्यों न देखें- पुरूषवादी सोच की जंजीरों में गहरे जकड़ें हों तो फिल्म आपको विचलित करेगी.

Friday, September 16, 2016

फिल्म समीक्षा

      पिंक देखिये और तय क ीजिये, आप कहां खड़े हैं


अभी कुछ दिनों पहले अमिताभ बच्चन ने एक भावनात्मक पत्र लिखा था, अपनी नातिन नव्या और पोती आराध्या के नाम. तब शायद समझ नहीं पाया था कि अचानक अमिताभ के अंदर ऐसे किस वैचारिक दर्द ने उथल-पुथल मचाया जिसने उन्हें ऐसा लिखने पर विवश किया. पर पिंक देख समझ में आया कि वो आंतरिक हलचल अचानक नहीं था, निश्चित ही फिल्म निर्माण की प्रक्रिया और उसकी किरदार में समाये अमिताभ ने उसकी वेदना को अपने कलम की स्याही बना डाली होगी. पिंक महज एक सिनेमा नहीं है, सोच है उस पुरूषवादी समाज की, जिसकी भेदती निगाहों के बीच हर रोज किसी लड़की को अपना रास्ता तलाशना पड़ता है. निर्देशक अनिरूद्ध राय चौधरी की सोच  थियेटर में आपके अंदर पल भर भी निश्चिंतता का भाव नहीं पनपने देगी. आप हर दृश्य के साथ अपने आस-पास की देखी घटना का मिलान करेंगे, हर किरदार में आपको कोई जाना-पहचाना चेहरा नजर आयेगा और हर संवाद आपको गहरे कचोटेगा. पिंक हर उस पुरूषवादी सोच को कटघरे में खींचती है जिनके लिए लड़कियों के कपड़े, उसके उठने-बैठने, बोल-चाल के तरीके और उसके खान-पान उसका कैरेक्टर तय करते हों. अफसोस ऐसी सोच के लोग गलत के खिलाफ महिलाओं के हक में थियेटर में तालियां तो बजाते हैं, पर बाहर आते ही फिर उसी कुंठित आवरण में खुद को समेट लेते हैं.
कहानी दिल्ली में जॉब करने वाली तीन लड़कियों मीनल अरोड़ा(तापसी पन्नू), फलक अली(कृति कुल्हारी) और एंड्रिया (एंड्रिया तरियांग) की है. आजाद ख्यालों वाली तीनों लड़कियां एक रॉक कंसर्ट के दौरान राजवीर (अंगद बेदी) व उसके दोस्तों डिंपी (राहुल टंडन) और विश्वा (तुषार पांडे) से मिलती हैं. डिंपी और मीनल के क्लासमेट होने की वजह से सब आपस में कंफर्ट फ ील करती हैं. सब खाते-पीते और मौज-मस्ती करते हैं. घटना उस वक्त मोड़ लेती है जब तीनों लड़कियों की मोडेस्टी को लड़के खुद के लिए मौका मान बैठते हैं. मीनल के इनकार के बावजूद राजवीर उससे जबरदस्ती की क ोशिश करता है. और इस क ोशिश में हुई हाथापाई में मीनल के हाथों राजवीर के सिर पर गहरी चोट आती है. घटना से घबरायी लड़कियां इस हादसे को भूलना चाहती हैं पर बदले की आग में राजवीर और उसके दोस्त ऊंची रसूख का इस्तेमाल कर उन्हें झूठे केस में फंसा देते हैं. सामाजिक तौर पर भी उन्हें तिरस्कृ त किया जाता है. पुलिस मीनल को अरेस्ट कर लेती है. तब उसी की सोसायटी में रहने वाले बुजूर्ग वकील दीपक सहगल(अमिताभ बच्चन) उसका केस अपने हाथ में लेते हैं. क ोर्ट रूम में लड़कों के वकील प्रशांत(पीयुष मिश्र) मीनल और उसकी सहेलियों को प्रोफेशनल सेक्स वर्कर साबित करने की क ोशिश करते हैं. झूठे गवाह और सबूतों के दम पर जीत की उसकी इस क ोशिश से दीपक सहगल का तजूर्बा किस हद तक लड़ाई लड़ पाता है इसका मुजायरा आप खुद थियेटर में करें तो बेहतर होगा. 
फिल्म भले अपने धीमेपन या मसालों के कम तड़का की वजह से थोड़ी खींज दे, पर कहानी के पीछे की सोच थियेटर के बाहर भी आपका पीछा नहीं छोड़ने वाली. तापसी और कृति स्थिति की भयावहता से जुझती लड़कियों के किरदार में समा सी जाती हैं. आश्चर्य होता है क ाफी समय से बॉलीवूड में होने के बावजूद हिंदी फिल्मकार तापसी की योग्यता का भरपूर उपयोग क्यों नहीं कर पाये. पीयुष और एंड्रिया भी सराहनीय हैं. पर अमिताभ, उम्र के इस पड़ाव में अपने हर अगले कदम से आश्चर्यचकित करते अमिताभ वाकई शोध के विषय हैं. उम्र व बीमारियों से जुझने के बावजूद लड़कियों के हक में लड़ते वकील सहगल के किरदार की मनोदशा उनसे बेहतर शायद ही कोई समझ पाता. 
क्यों देखें- वाकई अगर अपनी सोच को सकारात्मक दिशा में बदलने की ओर कदम उठाना चाहते हों तो एक बार जरूर देखें. 
क्यों न देखें- पुरूषवादी सोच की जंजीरों में गहरे जकड़ें हों तो फिल्म आपको विचलित करेगी.

दिल की बात..

सच कहा आपने बच्चन साहब, ना का मतलब ना ही होता है..

सिनेमाई समझ आने से क ाफी पहले..हां.. याद नहीं कबसे, पर क ाफी पहले से ये सुनता आ रहा हूं, मर्द को दर्द नहीं होता.. थोड़ी समझ बढ़ी तो जाना कि अमिताभ बच्चन के कहे ये डायलॉग केवल शब्द भर नहीं बल्कि पुरूषों की मजबूत पौरूषता दर्शाने की एक सोच थी. तबसे दिल यही मान बैठा था कि जिसे दर्द नहीं होता असल में मर्द वही होता है.
पर आज ये मिथक टूट गया. गहरे अवचेतन में जड़ें जमा चुका ये भ्रम तब चूर-चूर हो गया जब उसी अमिताभ बच्चन को थियेटर में(पिंक) आंखों से बह पड़ने को आतुर दर्द को खुद के अंदर जज्ब करते देखा. हर एक दृश्य के बाद मर्द की अमिट छवि मानवीय संवेदना के दर्द की आंच में पिघलती दिखी. बात केवल फिल्म की होती तो शायद दिल का ये भ्रम यथावत ही रहता, पर हफ्ते भर पहले की घटना याद आ गयी जिसने इस भ्रम पर एक करारा प्रहार किया.
 वो घटना जिसमें अमिताभ बच्चन ने एक भावनात्मक पत्र लिखा था, अपनी नातिन नव्या और पोती आराध्या के नाम. तब शायद समझ नहीं पाया था कि अचानक अमिताभ के अंदर ऐसे किस वैचारिक दर्द ने उथल-पुथल मचाया जिसने उन्हें ऐसा लिखने पर विवश किया. पर पिंक देख समझ आया कि वो आंतरिक हलचल अचानक नहीं थी, निश्चित ही फिल्म निर्माण की प्रक्रिया और उसकी किरदार में समाये अमिताभ ने उसकी वेदना को अपने कलम की स्याही बना डाली होगी.
भले ही अमिताभ ने पत्र में नव्या या आराध्या को संबोधित किया हो पर आज उस पत्र को दोबारा पढ़ने के बाद मुङो अपने आस-पास की हर लड़की नव्या और आराध्या ही दिख रही है. हर रोज संकीर्ण पुरूषवादी मानसिकता के सोच की चक्रव्यूह भेदने की क ोशिश करती आम लड़की, जिसे अमिताभ संबोधित करना चाह रहे हों.
फिल्म देखने के घंटों बाद बार-बार मन को क ोर्टरूम का वो दृश्य कचोट रहा है जहां वकील बने अमिताभ रह-रहकर दर्दभरा व्यंग्यात्मक प्रहार करते हैं उन सोचों पर, जो लड़कियों के कपड़े, उसके उठने-बैठने, बोल-चाल के तरीके और उसके खान-पान से उसका कैरेक्टर तय करते है. वो सोच जो एक जगह, एक सी मस्ती, एक से खान-पान वाले
दो लोगों में एक को सही और दूसरे को गलत सिर्फ इसलिए ठहराती है कि उनमें एक लड़का और दूसरी लड़की है. वही मस्ती, वही शराब लड़के के गले उतरते उसका स्टेटस सिंबल बताती है, पर लड़की के गले उतर जाए तो उसे ‘सहज उपलब्ध ’ भर बना डालती है. जो लड़कियों के कपड़े (जींस, स्कर्ट, टीशर्ट) की लंबाई से उसके कैरेक्टर के पैमाने का अंदाजा लगाती है.
वो सोच जिसने पूरी दुनिया को बस अपने घर की दहलीज के जरीये दो हिस्सों में बांट रखा है. दहलीज के अंदर की हर लड़की या महिला पाक-पवित्र पर उस दहलीज के बाहर की हर लड़की बस इस्तेमाल की चीज.
वो सोच जो लड़कियों के हंस-बोल कर बात करने या किसी लड़के को छूकर बात करने को ‘इनविटेशन का इंडिकेशन’ मानती है. लड़कियां भले ना-ना करती रहे पर उनपर हावी होने की वो सोच जो उन्हें ऐसा कर पूर्ण पुरूषस्व का अहसास दिलाती हो.
पर सच कहा आपने बच्चन साहब, ना का मतलब बस.. ना होता है. पर ये बात उन पुरूषवादी मानसिकता वाले को कौन समझाए जिनके आदर्श-स्त्री वाली सोच के खांचे में उनकी मां-बहन के अलावे कोई फिट ही नहीं बैठती. उन्हें कौन समझाए जो महिलाओं के हक में थियेटर में तालियां तो बजाते हैं, पर बाहर आते ही फिर उसी कुंठित आवरण में खुद को समेट लेते हैं. उन्हें उस दर्द का मतलब कौन समझाए जो किसी लड़की को उसकी मर्जी के खिलाफ छूने पर उसे हजारों-लाखों घावों से भी गहरे छलनी कर डालता है.
पर यकीन मानिये बच्चन साहब, मर्द की छवि वाले उस भ्रम के टूटने का आज कोई मलाल नहीं. शुक्रिया आपको, अपनी बनायी उस मिथक को हकीकत के उस हथौड़े से खुद ही तोड़ने का जो ये बात क ायदे से समझा गयी कि जिसे दर्द हो वही असली मर्द होता है.
मेरी तरह हर मर्द को दर्द हो, अभी तो बस इन्हीं उम्मीदों के साथ..
-गौरव




Saturday, September 10, 2016

फिल्म समीक्षा: फ्रीकी अली


कमजोर फिल्म को नवाज के क ांधे का सहारा
फिल्म इंडस्ट्री की ये विडंबना है कि यहां लोग क ामयाबी की सीढ़ी चढ़ते स्टार की इमेज भूनाने में लग जाते हैं. नवाजुद्दीन सिद्दीकी निर्विवादित रूप से आज के दौर के पसंदीदा स्टार हैं. अभिनय में उनकी स्वीकार्यता हर वर्ग में तेजी से बढ़ी है. ऐसे में सोहेल खान की फ्रीकी अली जैसी फिल्म उन्हें एक कदम पीछे ही खींचती है. नवाज ने सहज और आकर्षक अभिनय के दम पर फिल्म को उठाने की भरसक क ोशिश की है, पर सोहैल की कमजोर कहानी उनकी इस क ोशिश में बार-बार खलल पैदा करती है. सोहैल ने नवाज की असल जिंदगी से रिफरेंस लेते हुए फिल्म की कहानी बूनी जिसके केंद्र में गोल्फ रखा. पर अत्यधिक फिल्मी नाटकीयता और बाकी कलाकारों के उदासीन अभिनय की वजह से नवाज का प्रभाव भी कम हो जाता है.
कहानी लावारिस लड़के अली (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) की है जिसे एक हिंदू औरत (सीमा विश्वास)अपने बच्चे की तरह पालती है. बचपन से गलियों में चड्डियों की दुकान लगाने वाला अली क्रिकेट में क ाफी हुनरमंद है. पर पैसे कमाने की लालसा में वो मकसूद(अरबाज खान) के साथ मिल हफ्ता वसूली का धंधा करता है. एक दिन एक गोल्फर से पैसा वसूली करते हुए उसे गोल्फ खेलने की चुनौती मिलती है. उसके ये हुनर उसी के गांव के एक व्यक्ति किशनलाल (आसिफ बसरा)की नजर में आ जाता है. वो उसे अपनी जिंदगी सुधारने के लिए गोल्फ की ट्रेनिंग लेने को कहता है. इसमें मकसूद भी उसकी मदद करता है. टूर्नामेंट के दौरान उसका सामना गोल्फ के दिग्गज पीटर(जस अरोड़ा) से होता है. पर हुनर और मेहनत के दम पर गली का लड़का आखिर में गोल्फ चैंपियन बनता है.
सोहैल निर्देशन के स्तर पर फिल्म को एक साथ नहीं समेट पाए हैं. टूकड़ों-टूकड़ों में बंटी सी फिल्म कई मौकों पर उनके हाथ से छूटती नजर आती है. क ॉमिक सींस में भी आवश्यक पंच की कमी की वजह से दृश्य हल्के हो गये हैं. नवाज को फिल्म में किसी का आवश्यक सहयोग मिल पाता है तो वो हैं सीमा विश्वास. एमी जैक्शन और बाकी किरदार भी बस भरपायी के लिए गढ़े गए लगते हैं. गानों के बोल शायद ही याद रह पाएं पर संगीत थियेटर में सूनने लायक है. तो अगर ये फिल्म देखने की कहीं कोई गुंजाइश दिखती है तो वो बस नवाज के हिस्से जाता है.
क्यों देखें- चेहरे पर मुस्कान लाने वाली नवाज की नैसर्गिक अभिनय की खातिर एक बार देख सकते हैं.
क्यों न देखें- उम्दा कहानी से सजी किसी सशक्त फिल्म की उम्मीद में हों तो.